विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम में पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता को नई दिशा देने के लिए जिला प्रशासन ने एक अभिनव और दूरदर्शी पहल की शुरुआत की है. हिमालय की गोद में बसे इस पवित्र तीर्थस्थल को प्लास्टिक एवं सूखे कूड़े से मुक्त रखने के उद्देश्य से ‘कैरी मी बैक पॉलिसी’ लागू की जा रही है. यह पहल जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग विशाल मिश्रा के मार्गदर्शन में नगर पंचायत केदारनाथ द्वारा हीलिंग हिमालयास फाउंडेशन एवं सुलभ इंटरनेशनल के सहयोग से संचालित की जाएगी.
चारधाम यात्रा के दौरान प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं के केदारनाथ पहुंचने से प्लास्टिक बोतलें, पैकेजिंग सामग्री, रैपर और अन्य सूखा कूड़ा बड़ी मात्रा में एकत्र हो जाता है. समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस कचरे का समय पर निस्तारण एक बड़ी चुनौती बन जाता है. इसी चुनौती का स्थायी समाधान खोजते हुए प्रशासन ने इस अनूठी नीति को धरातल पर उतारने का निर्णय लिया है.
नई व्यवस्था के तहत नगर पंचायत केदारनाथ श्रद्धालुओं को लगभग 400 से 500 ग्राम क्षमता वाले विशेष बैग उपलब्ध कराएगी. इन बैगों में सूखा कूड़ा भरकर श्रद्धालु स्वयं उसे अपने साथ गौरीकुंड तक लेकर आएंगे. इससे धाम क्षेत्र में कूड़े का संचय नहीं होगा. स्वच्छता व्यवस्था को बनाए रखने में बड़ी सहायता मिलेगी. इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि श्रद्धालु केवल दर्शनार्थी ही नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के सक्रिय सहभागी भी बनेंगे. प्रशासन का मानना है कि जनसहभागिता के बिना हिमालयी तीर्थस्थलों को स्वच्छ और सुरक्षित बनाए रखना संभव नहीं है.
इस महत्वाकांक्षी अभियान में हीलिंग हिमालयास फाउंडेशन यात्रियों को कूड़ा बैग उपलब्ध कराने तथा गौरीकुंड में संग्रहण केंद्रों की व्यवस्था सुनिश्चित करेगा. वहीं सुलभ इंटरनेशनल द्वारा एकत्रित कूड़े का उठान कर उसका वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप अंतिम निस्तारण किया जाएगा. नगर पंचायत केदारनाथ पूरी प्रक्रिया की निगरानी एवं समन्वय की जिम्मेदारी निभाएगी.
उपजिलाधिकारी ऊखीमठ एवं प्रभारी अधिकारी नगर पंचायत केदारनाथ के निर्देशन में संचालित यह अभियान केवल कूड़ा प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं में पर्यावरणीय चेतना विकसित करना भी है. प्रशासन चाहता है कि बाबा केदार के दर्शन के साथ श्रद्धालु हिमालय की स्वच्छता और प्रकृति संरक्षण का संदेश भी अपने साथ लेकर जाएं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल होता है तो भविष्य में इसे अन्य हिमालयी तीर्थस्थलों और पर्यटन क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है. इससे न केवल कूड़ा प्रबंधन की समस्या का समाधान होगा, बल्कि संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को भी संरक्षण मिलेगा.